दही

दूध में दही का जामन देकर रख देने से दही के जीवाणु बड़ी तेजी से बढ़कर दूध को 8-10 घंटे में ही दही बना देते है ताजा दही ही विशेष रूप से जीवनदायिनी शक्तिवर्धक होती है।

रखा रहने पर धीरे-धीरे इसकी जीवन-शक्ति घटती है और वह खट्टा हो जाता है।

आयुर्वेदिक ग्रन्थ “भाव-प्रकाश एवं सुशुरुत संहिता” के अनुसार बिना मथे दही खाने से शरीर के श्रोतो में अवरोध पैदा करता है। रोग, आलस्य, कफ, सूजन, मवाद और मोटापा बढ़ाता है।

दही स्निग्ध (चिकना) और भारी होता है और वात, पित्त और रक्त-विकार नाशक होता है, यह गर्म, अग्नि-प्रदीपक, कुछ कसैला, थोड़ी खटास युक्त मीठा होता है।

सही ढंग से इसका सेवन मूत्रकृच्छ (पेशाब में रूकावट), सर्दी, जुकाम, मलेरिया, अरुचि और दुर्बलता में लाभदायक होता है और बलवीर्य को बढ़ाने वाला होता है।

जो दही अच्छी तरह जमा न हो वह त्रिदोषकारी और जलन पैदा करने वाली होती है। अतः जो ठीक से जमा, गाढ़ा होता है और कुछ खट्टास युक्त हो ऐसे अच्छे स्वाद वाली दही को मथकर ही सेवन करना चाहिए। मथने से यह एक गुणकारी वस्तु बन जाती है।

ठीक से जमा दही यानि सुस्वाद दही को भी रात को कभी-भी सेवन नहीं करना चाहिए — रात में सेवन करने से यह लाभ की बजाय हमेशा नुकसान ही पहुंचाता है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार रात में इसका सेवन गौ-मांस सेवन के समान पाप माना गया है।

दही का सेवन बसंत, ग्रीष्म, और शरद ऋतू यानि मार्च, अप्रैल, मई, जून, सितम्बर और अक्टूबर में नहीं करना चाहिए। मथी हुई दही का सेवन नवंबर, दिसंबर, जनवरी, फरवरी में विशेष लाभदायक होता है।

दही से बना रसाला कफ बढ़ाने वाली बसंत ऋतू यानि मार्च, अप्रैल को छोड़कर युक्तिपूर्वक गर्मी के मौसम में सेवन किया जा सकता है।

मथने से बनी दही

घोल : – दही की मलाई हटाए बिना और बिना पानी मिलाये मथने से घोल बनता है यह अधिक भारी और बलदायक है लेकिन कफ को बढ़ाता है। इसमें बुरा मिलाकर सेवन आम के समान बलदायक होता है।

इसका सेवन सेंधा नमक, सौंठ, काली मिर्च, अजवाइन, राई, हींग और जीरे के चूर्ण के साथ करना सबसे बढ़िया होता है ।

मथित :– दही के ऊपर की मलाई हटाकर बिना पानी डाले मथने यह तैयार होता है इसका सेंधा नमक, सौंठ, काली मिर्च, अजवाइन, राई, हींग और जीरे के चूर्ण के साथ सेवन करते है। उचित मात्रा में सेवन करना वात, पित्त और कफनाशक होता है यह शक्तिवर्धक होता है।

रसाला या शिखरन
ठीक से जमे गाढ़े दही को कपडे में लटका देने से थोड़ी देर में उसका पानी निकल जाता है जिसको तोड़ कहा जाता है फिर इस दही के कपडे को किसी बर्तन के मुँह पर बांध लेते है फिर उस पानी रहित दही में उससे दोगुना शीतल दूध और बिना केमिकल्स से बनाई खांड या बुरा मिलाकर हाथ या चम्मच से दूध, दही और बुरा मिलाते हिलाते है धीरे-धीरे दही बूरा के साथ पतला होकर नीचे के बर्तन में इकट्ठे हो जाते है।

अब कपडे से छने इस रस में मौसम के अनुसार लवंग, कपूर, केवड़ा, गुलाबजल या इलायची आदि यथा योग्य प्रमाण में मिलाकर सेवन करें।

यह कफवर्धक होता है इसलिए मार्च, अप्रैल को छोड़ कर गर्मी के मौसम में इसका सेवन किया जा सकता है इससे बलवीर्य की वृद्धि होती है।

यह बलदायक, रुचिकारक, वातपित्त नाशक, अग्नि-दीपक, मधुर, शीतल है और कब्ज नहीं करता है। प्यास, रक्तपित्त और जुकाम को नष्ट करता है।
फिर भी बल के अनुसार सेवन करे नहीं तो हानि पहुंचाएगा।

जब इसका सेवन करना हो तभी इसको बनाये, बनाकर रख देने से यह ख़राब हो जाता है।

तक्र :– चौथाई पानी डालकर मथा हुआ मलाई रहित दही तकर कहलाता है। यह अग्नि-दीपक, वात और कफ नाशक होता है। हल्का होने से यह ग्रहणी में विशेष लाभदायक होता है। यह मल को बांधता है और पित्त को कुपित नहीं करता है।

अतः भोजन के बाद तकर का सेवन करने वाला मनुष्य रोगी नहीं होता है और तकर द्वारा शांत हुए रोग दुबारा नहीं होते है।

बवासीर को जड़ से ख़त्म करने की दवा तकर ही है इसमें सेंधा नमक और अजवाइन के चूर्ण के साथ तकर का सेवन करते है।

पेशाब रुक कर या कम आने पर तकर या छाछ पुराने गुड़ के साथ देते है।

विशेष ध्यान देने योग्य जानकारियां :–

ऋतुओं के अनुसार 14 नवंबर से 13 फरवरी तक पाचन शक्ति के अनुसार घोल, मथित, तकर सेवन करना चाहिए। 14 फरवरी से 13 अप्रैल तक इनका सेवन नहीं करना चाहिए। 14 अप्रैल से 13 जुलाई तक उचित मात्रा में रसाला लेते है। 14 जुलाई से 13 सितम्बर तक मथित ले सकते है। 14 सितम्बर से 13 नवंबर तक (शरद में) रसाला लेते है।

एक बार में पाव भर से डेड पाव तक ले सकते है। अधिक सेवन उचित नहीं है।

दही तकर आदि का सेवन रात में वर्जित है।

पुराने जुकाम, श्वास और खांसी के समय छोंकी हुई छाछ का उपयोग करना चाहिए।

सावधानी :–

सूतिका महिला को कभी-भी तकर या छाछ नहीं देना चाहिए।

आमतौर पर नमक और मसालों के साथ ही इसका सेवन करना चाहिए। मीठा मिलाकर सेवन वैद्य के परामर्श के अनुसार ही करना चाहिए।

यदि इनको लेने से अधिक पेशाब आती हो, मल पतला हो जाता है, डकारें आती है और आलस्य भी आता है।
अतः आजमा कर रूचि के अनुकूल से ही तकर आदि का सेवन बढ़ावें और धीरे-धीरे ही प्रयोग घटावें।

कफ के रोगी को चिकनाई निकालकर, पित्त के रोगी को मलाई हटाकर मथे आधी चिकनाई युक्त और वात के रोगी को मलाई सहित मथे पूरी चिकनाई युक्त तकर के परभेद दिए जाते है।

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