मलेरियामलेरिया बुखार एक प्रकार का संक्रामक रोग है जो मच्छर के काटने से होता है आयुर्वेद में इसे विषम शीतजवर कहते है एलोपैथी चिकित्सा में इसे इंटरमिटेंट फीवर, मार्श फीवर भी कहते है आमजन इसे जुडी बुखार या जाड़े का बुखार भी कहते है यह बुखार ज्यादा वहीँ होता है जहाँ पर मच्छर अधिक होते है वृक्षों के सूखे पत्ते जब पोखरों, गड्डो या किसी अन्य वस्तु जिसमे पानी हो उसमे मिल कर सड़ने लगे उससे जो जहरीली हवा पैदा होती है फिर उस गंदे पानी में जो मच्छर पनपते है वो मलेरिया का मख्य कारण है वैसे तो ये बुखार किसी भी अवस्था में आ सकता है पर कहते है की जवानी में यह विशेषकर आता है जिस साल गर्मी ज्यादा होती है उस साल वर्षा के बाद मलेरिया बहुत आता है
इसमें पहले जाड़ा लग कर बुखार चढ़ता है यह एकाहिक, तृतीयक (तिजारी) और चौथिया भी हो सकता है एकाहिक में मलेरिया जहर ज्यादा होता है, तृतीयक में उससे थोड़ा कम और चौथैया में सबसे कम मलेरिया जहर होता है
मलेरिया में रोगी को पहले जाड़ा लगता है ठण्ड से रोगी कांपने लगता है यह हालत 5 मिनट से 3 घंटे हो सकता है किसी को 5 मिनट किसी को 30 मिनट और किसी-किसी को 2 या 3 घंटे तक जाड़ा
लगता है 3 घंटे से ज्यादा ठण्ड नहीं लगती मलेरिया में| इसके बाद गर्मी का जोर होता है रोगी को प्यास लगती है ठण्ड के बाद शुरू में रोगी को गर्मी अच्छी लगती है पर थोड़ी देर बाद वह गर्मी से बैचैन हो जाता है यह हालत 25 मिनट से 1 घंटा हो सकती है इसके बाद पसीने आने लगते है यह मलेरिया की अंतिम अवस्था होती है पहले चेहरे और माथे पे पसीना आता है फिर पुरे शरीर में पसीना आने लगता है ऐसे समय में बाहरी हवा नुकसानदायक हो सकती है पसीना आने के बाद बुखार उतर जाता है और रोगी उठ बैठता है कुछ तो अपना काम भी करने लग जाते है पर ये सिर्फ शुरू में ही होता है जैसे-जैसे यह रोग पुराना होता जाता है रोगी कमजोर हो जाता है
एकाहिक बुखार में यह अक्सर बहुत दिनों तक आया करता है ज्यादातर यह सवेरे मालूम होता है सावन, भादों में यह ज्यादा आता है यह रोज-रोज आता है लेकिन कभी-कभी तीसरे-चौथे दिन भी आता है रोज आने से तीसरे-चौथे दिन आना जल्दी आराम होने की निशानी है एकाहिक बुखार २४ घंटे में एक बार आता है पर कभी-कभी यह दिन-रात में २ बार आता है तब इसको एलोपैथी में रेमिटेंट फीवर भी कहते है इसमें पहले ठण्ड पीठ से शुरू होती है और थोड़ी देर बाद ही सारे शरीर में ठण्ड लगनी शुरू हो जाती है उस समय प्यास लगती है, जी घबराता है और सिर में दर्द होता है पेशाब बार-बार आता है खून की चाल धीमी होने से नाड़ी की गति मन्दी हो जाती है जाड़ा लगने से शरीर का ताप कम नहीं होता है कभी-कभी तो शरीर का ताप १०६ डिग्री तक पहुँच जाता है नवीन ज्वर में खून जमा होने से जाड़ा ४-५ घंटे तक हो सकता है परन्तु जैसे-जैसे बुखार पुराना होगा जाड़ा लगने का समय घटने लग जाता है इसकी दूसरी अवस्था में जाड़ा कम होकर गर्मी लगने लगती है गर्मी बढ़ने से खून की गति बढ़ जाती है जिससे नाड़ी की गति भी बढ़ जाती है सिर दर्द बढ़ जाता है रोगी थोड़ी-थोड़ी देर में पानी मांगता है गिलास होठों से अलग नहीं करना चाहता इस समय उबकाई आती है उलटी होती है, घबराहट बढ़ जाती है तीसरी अवस्था में माथे और चेहरे पे पसीने आकर पुरे शरीर में पसीना आता है जैसे-जैसे पसीने आते है वैसे-वैसे बुखार कम होता जाता है १५ मिनट में बुखार बहुत कम हो जाता है
तिजारी में यह तीसरे यानि ४८ घंटे के अंतर् से होता है इसमें गर्मी ज्यादा रहती है इसका जोर ४ घंटे तक रहता है एलोपैथी चिकित्सक के अनुसार यह २३ घंटो तक चढ़ा रहता है यह दोपहर या शाम के समय होता है पहले दिन बुखार चढ़ कर दूसरे दिन बुखार बिलकुल नहीं होता फिर तीसरे दिन पहले दिन की तरह आ जाता है
चातुर्थिक ज्वर – यह बुखार एक दिन आकर दो दिन बिच में नहीं आता यानि चौथे दिन आता है यह ७२ घंटे के विराम के बाद आता है यह तीसरे पहर यानि कोई २-३ बजे के आस-पास चढ़ा करता है कभी-कभी इसकी दो बारी बराबर आती है इसमें जाड़ा बहुत देर तक रहता है और गर्मी थोड़ी देर रहती है यह बुखार ५ घंटे तक जोर करता है यह बड़ा ख़राब बुखार है कभी-कभी कई वर्षो तक पीछा नहीं छोड़ता और बड़ी मुश्किल से आराम आता है

रोग की घटती-बढ़ती की पहचान –
जब ये बुखार अपने आने के समय को बदलने लगे, अपने समय को छोड़ कर दूसरे समय पे आने लगे तब रोग की कमी समझनी चाहिए और अगर बुखार अपने समय से पहले चढ़ने लगे तो समझ लेना चाहिए रोग बढ़ चूका है दवा जब इसपर अपना असर करने लगती है तब यह पहले समय बदलता है और बाद में एकदम बंद हो जाता है

चिकित्सा विधि –

इसमें दो तरह से चिकित्सा की जाती है
१. जिस दिन बुखार की बारी हो यानि की बुखार में – अगर खाना खाने के बाद बुखार आ जाये और जी मिचलाता हो तो किसी वमन कारक औषधि को पिलाकर उलटी करा देनी चाहिए, ठण्ड लगने पर गरम कपडे उड़ा देने चाहिए, शीतनाशक लेप करना चाहिए, गरम-गरम चाय पिलानी चाहिए गरम पानी बोतल में भरकर उसपर कपडा लपेटकर सेक करना चाहिए
और जब जाड़ा लगना बंद हो जाये तब प्यास और दाह का इलाज करना चाहिए पसीने निकालने या दस्त कराने का प्रयत्न करना चाहिए ऐसी हालत में अरंडी का तेल पिलाना हितकर होता है जब पसीना आने लगे तब किसी तरह के इलाज की जरुरत नहीं होती बस उस समय रोगी को हवा से बचाना चाहिए

पसीना लाने की विधि – गरम-गरम चाय पिलाने से या गरम-गरम (निवाया) पानी पिलाने से पसीना आने लगता है

दस्त कराने की विधि – इसके लिए अरंडी का तेल २-३ तोले पिलाने से दस्त आ जाता है अरंडी का तेल सीधा ही या पाव भर गरम दूध में या त्रिफले के काढ़े में मिलकर पिलाना चाहिए
दस्त कमजोर रोगी को नहीं देना चाहिए अगर जरूरत हो तो हल्का देना चाहिए
प्यास रोकने के उपाय –
बुखार में प्यास रोकने के लिए एलोपैथी चिकित्सा में तो सोडावाटर पिलाते है वैद्य लोग मुँह में आलूबुखारा रखाते है
२. जिस दिन बुखार नहीं चढ़ता – बुखार उतर जाने पर ज्यादातर दवाये बुखार की बारी रोकने के लिए दी जाती है भुनी फिटकरी ४-५ रत्ती मिश्री मिलकर देनी चाहिए इससे भी बुखार की बारी रुक जाती है जिनको खांसी हो उनको फिटकरी नहीं देनी चाहिए जिन्हे फिटकरी न देनी हो उन्हें तुलसी के पत्ते और कालीमिर्च की गोलियाँ बनाकर खिलानी चाहिए ये गोलियां कुनेन से कम नहीं है

मलेरिया की निवृति के लिए निम्नलिखित नुस्खे हितकर है
१. गुडुच्यादि क्वाथ – गुडुची, मुस्ता, चिरायता, त्रिफला, दारुहल्दी, अतिविषा, कटुकी, करंज के बीज, सप्तपर्ण
पर्पट, धमासा, कंटकारी, सिनकोना, समान-समान का दो तोला क्वाथ दिन में २ बार पिप्पली चूर्ण आधा माशा के साथ ले
२. लाल फिटकरी की खील ४ रत्ती की मात्रा में थोड़ी मिश्री के साथ मिलकर दिन में ३ बार पिलाये
३. गोदन्ती भस्म ४ रत्ती की मात्रा में मिश्री के साथ दिन में तीन बार देवे ।
४. बार-बार आने वाले मंद ज्वर के लिए गुडुची ४ इंच लम्बी, पिप्पली ३ अदद, हरीतकी की १ अदद, अजवाइन ४ माशा, बादाम ७ अदद, दिन-रात भिगोकर छानकर थोड़ा लवण मिलाकर सुबह एक बार १५ दिन तक पिलाते रहे।

५. ताजा लाल मिर्च का रस निकालकर ३-३ बूँद कान में डालें । डालते ही चौथैया आदि ज्वर दूर हो जायेंगे
६. काली मिर्च और तुलसी के पते दोनों को बारीक़ पीसकर उड़द के बराबर गोलिया बनाकर २ गोली प्रतिदिन गरम दूध या पानी के साथ सेवन करने से बुखार जादू की तरह छु-मन्त्र हो जाता है ।
७. नीम की छाल १०० ग्राम को कूटकर मिटटी के बर्तन में आधा किलो पानी में डालकर इतना औटाये की पानी एक चौथाई भाग शेष रह जाये । उसके बाद इस पानी को छान कर इसमें शहद और मिश्री मिलाकर रोगी को पिला दे और चादर उड़ा कर लेटने को कहे। थोड़ी देर में पसीना आकर बुखार उतर जायेगा। यदि आवश्यकता हो तो दूसरे दिन भी यह प्रयोग कर सकते है पसीना लाने में यह अंग्रेजी दवा “पेरासिटा मोल” और गुण में “क्विनीन” का भी बाप है ॥
८. पानी २५० ग्राम, दूध ५०० ग्राम, शीशम का बुरादा ६ ग्राम तीनो को मिलाकर खूब औटाये। जब दूध शेष रह जाएँ तब उतार कर छान ले और रोगी को पिलायें। यह योग सभी तरह के बुखारों में बहुत लाभदायक है ॥
९. आक के पीले पत्ते आग में जलाकर भस्म कर ले और आधा ग्राम की मात्रा में लेकर शहद के साथ सेवन कराये। इसके सेवन से शीत ज्वर तुरंत भाग जाता है॥
१०. अजवाइन १ तोला सुबह के समय एक कोरी मिटटी के बर्तन में २५० ग्राम पानी में भिगोकर दिन के समय में छाया में और रात में बाहर ओस में रखें, फिर दूसरे दिन सुबह के समय छानकर रोगी को पिलायें। यह लगातार १०-१२ दिनों तक रोगी को दे। यदि उतने दिनों में लाभ न हो तो अधिक समय तक निसंकोच प्रयोग कर सकते है। यह योग पुराने ज्वर में – जिसमे हल्की-हल्की हरारत हर समय रहती है, तिल्ली और जिगर भी बड़े हुए होते है – में जरूर लाभ करता है इसके उपयोग से भूख भी खुल कर लगती है वैद्य समाज ने इस योग को ‘अजवाइन आठ पहरि’ नाम दे रखा है॥
११. निम्बू में संक्रामक रोगो को खत्म करने का गुण होता है हैज़ा, टाइफाईड, प्लेग, संग्रहणी और मलेरिया में निम्बू में काली मिर्च, नमक मिलाकर हल्का सा गरम करके चूसना लाभदायक है॥
१२. यदि हर दिन एक ही समय पर जाड़ा देकर बुखार आये तो बुखार आने से दो घंटे पहले हाथ-पैर के नाखुनो पर लहुसन के रस का लेप करना चाहिए और साथ ही ५ ग्राम भर लहुसन के रस को उतने ही तिल के तेल में मिलाकर १-१ घंटे पर जब तक बुखार न आ जाये तब तक चाटना चाहिए। बुखार आ जाने पर इसे चाटना बंद कर देना चाहिए। तीन दिन तक यही उपयोग करें। लाभदायक योग है
१३. अदरक के ६ ग्राम रस के साथ समभाग शहद मिलाकर दिन में ३-४ बार सेवन करना हर तरह के बुखार में लाभदायक है
१४. निम्बू का रस तेज कॉफ़ी में बिना दूध मिलाये सेवन कराना मलेरिया बुखार में परम हितकर है।
१५. फिटकरी का फूला ३ रत्ती और इतनी ही खांड मिलाकर बुखार आने से ६ घंटे पहले (३-३ माशा) २-२ घंटे के अंतर से सेवन कराने से बुखार नहीं चढ़ता। मलेरिया में बहुत लाभदायक योग है। बकरी के दूध के झाग से भी मलेरिया बुखार नष्ट हो जाता है

 

सन्दर्भ: नुस्खे 1-4 ( आधुनिक चिकित्सा), 5- 15 ( आयु. चिकि. प्रकाश)

नोट : उपयोग से पहले चिकित्सक से परामर्श जरूर करें।

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