तेल मालिशमालिश का जो महत्व आयुर्वेद में बताया गया है उतना किसी दूसरी पैथी में नहीं मिलता है। मालिश दो तरह की होती है :

  •  सुखी मालिश
  • तैलों के द्वारा मालिश

आयुर्वेद के अनुसार तेल मालिश बुढ़ापे व रोगों को हटाकर दीर्घायु, त्वचा को कोमलता, सुंदरता, अंगो को लचक व दृढ़ता और शक्ति देती है।

तेल मालिश आँखों की रौशनी व बुद्धि को बढ़ाती है और नसों व नाड़ियों में रुकी हुई दूषित वायु और रसों को निकालकर थकावट दूर करती है, अच्छी नींद लाती है

इसलिए वाग्भट्ट जी ने नित्य पुरे शरीर पर तेल मालिश करने की, विशेष रूप से सिर और पैरों की मालिश करने की सलाह दी है।

सिर की मालिश :- तेल द्वारा नित्य सिर की मालिश करने से न तो बाल झड़ेंगे, न ही सफ़ेद होंगे, न ही गंजे होंगे और न ही सिर में दर्द होगा।

पैरों की मालिश :- नित्य पैरों की मालिश करने से न तो अर्धांग (साइटिका) आदि दर्द होंगे, न ही भडकन होगी, न तो पैर फटेंगे, न ही पैरों की नसे कमजोर होकर पैर सुन्न होंगे और न ही जकड़ेंगी और बेकार होंगे।

स्वास्थ्यवृत्त समुच्चय ग्रन्थ में लिखा है ठन्डे मौसम में गरम और गरम मौसम में ठन्डे तेलों से प्रतिदिन मालिश करने से स्वास्थ्य मिलता है।

प्रतिदिन आँखों को पानी से धोने से, व्यायाम करने से पैर व तलवों में तेल मलने से, कानो व सिर में तेल डालने से असमय आने वाले बुढ़ापे के लक्षण या बुढ़ापे के समय होने वाली जकड़न, दर्द, कमजोरी या रोग दूर किये जा सकते है।

सनातन धर्म की नित्यकर्म पद्धति के अनुसार तेल मालिश सोमवार में शोभा, बुधवार में धन और शनिवार में सुख देने वाली होती है।

रक्तचाप एवं ह्रदय रोग में मालिश :- आधुनिक डॉक्टर भी मानते है जब रक्त के थक्के धमनियों में रुकते है उस समय उपचार के साथ मालिश भी जरूरी होती है ऐसा करने से पुनः धमनियों में रक्त संचार होने लगता है। उस समय पर घी, मक्खन और मलाई बंद होती है क्योंकि इनसे रक्त के थक्के बढ़ते है रोगियों को ऐसा आहार दिया जाता है जिससे गन्दा कोलेस्ट्रॉल (L.D.C.) न बने।

  • तेलों के शोधन की विधि :–

आयुर्वेद के अनुसार खाने या लगाने के लिए तिल, सरसों या अण्डी के तेलों का शोधन करके ही उपयोग करना चाहिए। सभी तरह के तेलों के शोधन की विधि एक ही है।

एक किलो तेल के शोधन के लिए 100 ग्राम मंजीठ (मंजिष्ट), 10 ग्राम सैंधा नमक, 10 ग्राम हल्दी, 10 ग्राम आंवला, 10 ग्राम बहेड़ा के छिलके, 10 ग्राम हरड़ के छिलके लेकर कूटकर दरदरा जौं-कूट कर ले। इन सबको मिटटी के बर्तन में 5 किलो पानी डालकर 24 घंटे रहना दे।

बाद में किसी कढ़ाई में डालकर औटावें। उबाल आने पर भी धीमी आंच पर उबलते रहें। जब पानी 1 किलो के आस-पास रह जावें तब उसको किसी कपडे से निचोड़ कर स्टील के बर्तन में डालकर उसमे 1 किलो तेल भी डाल कर और उबलने को छोड़ दें।

उबाल आने पर आंच धीमी कर दें। जितना पानी 10 मिनट में जले उतना ही सादा पानी उसमे डाल दें। इस तरह हर 10 मिनट बाद थोड़ा-थोड़ा पानी डालते जावें जिससे वह 5 घंटे तक उबल जाये।

इसके बाद पानी ना डालें और जब लगभग 100 ग्राम पानी रह जाये तब बर्तन को आग से उतार ले। ठंडा होने पर छानकर शीशी में डाल लें।

इसको खाने या लगाने दोनों प्रयोगो में लें सकते है। इस तेल की तासीर गरम है और ठन्डे मौसम के लिए उपयुक्त है।

मालिश के तेल में अमृतधारा भी डाल सकते है। 4 भाग अजवाइन का सत्व, 2 भाग कर्पूर और 1 भाग पिपरमेंट डालकर अच्छी तरह डाट लगाकर शीशी में बंद करके रखने से तेल में डालने लायक अमृतधारा तैयार हो जाती है।

गर्म मौसम में उपयोग के लिए पहले बताये तरीके से तेल में चौथाई आवंले का रस या 200 ग्राम सूखे आवंलो का काढ़ा ( 4 किलो पानी में उबालने से जब 1 किलो रह जाये ) डालकर उबालते है और जैसे-जैसे रस सूखता जाता है ताजा जल डालते जाते है। 4 घंटे उबलने के बाद में उसको आग से उतारकर ठंडा होने पर छान कर रख लेते है।
यह गर्मी के मौसम में खाने और मालिश करने के लिए उपयुक्त है।

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